Reckeweg R50 in Hindi, स्त्री रोग एवं त्रिकश्रोणि सम्बन्धी रोगों की दवा

R50 Homeopathy medicine in Hindi, Stree vikoron ki dawa

R50 in Hindi मूल-तत्व : ऐसकुलस D6, सिमिसिफ्यूगा D4, कोलोसिंथिस D6, नैट्रम क्लोरेट D30, नक्स वोमिका D30, फाइटोलैका D8, स्ट्रोंशियम कार्ब D12.

लक्षण : त्रिकास्थि भाग में विभिन्न प्रकार के दर्द, जो मुख्यतः पेट रोगों के परिणामस्वरूप होते हैं। रीढ़ की हड्ड़ी में दर्द, अनिश्चित कारणों से उत्पन्न त्रिकास्थि सम्बन्धी तकलीफें। दर्द कशेरुका खण्डों से होते हुए सिर तथा नाक की नोक तक जाता हुआ, कभी-कभी पेट के अंगों में भी। गति के समय पीड़ा बढ़ जाती है किंतु रात में या आराम करते समय तीव्र हो सकती है।
त्रिकास्थि भाग बार-बार श्वेत-प्रदर के पुनः विषकारी उपचारों जैसे दहन क्रिया के उपचार आदि से होता है।
क्रिया विधि : ऐसकुलस चीरने वाले दर्द (बवासीर की भाँति), त्रिकास्थि तक फैलते दर्द।
कोलोसिंथिस : त्रिकास्थि (sacral) भाग में तेज़ दर्द, टाँगों तक फैलता दर्द।
सिमिसिफ्यूगा : स्त्री-जननांगो पर विशिष्ट प्रभाव। मासिक स्त्राव के पूर्व वक्ष में उठने वाले दर्द को रोकती है। पेट के अंगों के सम्बन्ध में त्रिकास्थि भाग सम्बन्धी तकलीफों पर, पीठ और सिर और नाक तक फैलते दर्द पर विशिष्ट क्रिया।
खोपड़ी की हड्डियां टूट जाने अथवा मस्तिष्क के आघात के बाद होने वाले दर्द में भी प्रभावशाली हो सकती है।
पूटठों (tendons) और हड्डियों को जोड़ने वाले स्नायुओं के आमवात (rheumatism) में अनुकूल प्रभाव।
नेट्रियम क्लोरेट : त्रिकास्थि भाग के दर्द, साथ में कब्ज़ियत तथा कँपकँपी, अन्ततः सुबह के समय छींक तथा अधीरता युक्त अति संवेदनशीलता।
फाइटोलैका : त्रिकास्थि अंगों में साइटिका (Sciatica) जैसा दर्द, टाँगों तक फैलता दर्द, त्रिकास्थि भाग में कमजोरी (विशेषकर खड़े होते समय), कटि प्रदेश में कुचले जाने की अनुभूति।
स्ट्रोंशियम कार्ब : विभिन्न प्रकार के जोड़ों के प्रदाह तथा आमवात (rheumatism), मुख्यतः नितम्ब और कूल्हे के जोड़ों में पीड़ा।

खुराक की मात्रा : लंबे उपचार के लिए, प्रतिदिन ३-४ बार भोजन के पूर्व थोड़े पानी में १०-१५ बूँदें लें। बार-बार होने वाले तीव्र दर्द में तथा उनके बढ़ जाने पर, थोडे समय के लिए (१/२ से १ घंटे) प्रत्येक ५-१० मिनट पर १०-१५ बूँदें लें। प्राथमिक प्रतिक्रिया (रोगवृद्धि) पर उपचार १-२ दिनों के लिए रोक देना चाहिए, तत्पश्चात १-२ दिनों तक ५-१० बूँद लेनी चाहिए। उपचार के बाद, पूरी तरह दर्द समाप्त होने के बाद भी पुनः दर्द होने से बचने के लिए कम से कम ३ माह तक दिन में १-२ बार ५-१० बूँदें लेना जारी रखें।

टिप्पणी : पूरक दवायें :
R 38, पेट शोथ में (दाहिनी ओर)।
R 39,पेट शोथ में (बाँयीं ओर) और रसौली में।
R 37, कब्ज़ियत आँतीय सुस्ती, पेट फूलने में (लगातार बढ़ने वाले त्रिकास्थि सम्बन्धी दर्द)।
R 31, दुर्बलता तथा अल्परक्तता में।
R 16, अर्धकपाली या आधाशीशी के दर्द (migraine) में।
R 20, अंडाशय के क्रियात्मक व्यवधान में।
R 13, बवासीर में
R 10, जब रजोनिवृति के समय दर्द हो।
R 28, मासिक धर्म के समय दर्द में।
R 11, सामान्य आमवाती (Rheumatic) संरचना में।

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