R47 hysteric drops in hindi, वातोन्माद या हिस्टीरिया सम्बन्धी रोग की दवा

R47 drops in hindi for all hysteric complaints in hindi, वातोन्माद या हिस्टीरिया सम्बन्धी सभी रोगों की दवा

मूल-तत्व: एसाफोएटिडा D12, ग्लोनोइनम D12, इग्नेशिया D30, लैकेसिस D30, मोसकस D12, कॉफिया D30, पल्साटिल्ला D30.

लक्षण: वायु गोला (Hysteric ball)। उदर से गले तक सिकुड़न तथा हलचल। शोर के प्रति संवेदनशीलता, रोगभ्रम तथा स्त्रियों में वातोन्माद (Hysteria)। अन्य वातोन्माद (Hysteria) सम्बन्धी संवेदनायें, रात में घुटन, गले में स्पंदन तथा संकुचन। मासिक धर्म से पहले रोगवृध्दि।

क्रिया विधि: होम्योपैथिक चिकित्सा का मिश्रित प्रभाव जैसा कि R 47 में पाया जाता है, एक अंग या उलझे हुए लक्षणों पर विशिष्ट तरीके से कार्य करता है, विशेष रूप से वायु गोला बनना (Hysteric ball) तथा अन्य ऐसी ही स्थितियों में।
एसाफोएटिडा: गले में गोला होने की अनुभूति।
ग्लोनोइन: गले में महसूस होने वाली सशक्त नाड़ी तथा घुटन की अनुभूति। शोर के प्रति अतिसंवेदनशीलता।
इग्नेशिया: गले में दबाव की अनुभूति, वायुगोला (Hysteric ball) जो खाते या निगलते समय गायब हो जाता है। वायुगोला (Hysterical ball) तथा छाती में दबाव की अनुभूति जो अमाशय से ऊपर की ओर उठती है, विशेषकर अगले मासिक स्त्राव के पूर्व। अनिद्रा, अत्यधिक अधीरता।
लैकेसिस: घुटन की अनुभूति, गले के चारों ओर कपड़े का कसाव सहन नहीं होता, रात में अचानक जगा देने वाले दौरे।
मोस्कस: स्त्रियों में वातोन्मादी रोगावस्थाओं (Hysterical) में शोर तथा गंध के प्रति संवेदनशीलता।
कुल मिलाकर, R 47 स्त्रियों की इस तरह की उन सभी शिकायतों पर क्रिया करती है, जो हर उम्र में होती है, युवावस्था में और साथ ही रजोनिवृति काल में भी। स्पष्ट रूप से ऐसी शिकायतें अंडाशय में होने वाले क्रियात्मक व्यवधान के कारण होती हैं, जो लैकेसिस तथा अन्य मूल-तत्वों के द्वारा अवश्य प्रभावित होती है। किसी मनोचिकित्सा की तुलना में R 47 अधिक प्रभावी है, जो शिकायतों को तेज़ी से कम करता है और वे तदुपरांत गायब हो जाती हैं।
नर्तन रोग (St. Vitus’ dance) में भी इसे पूरक दवा के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

खुराक की मात्रा: प्रारंभ में प्रतिदिन ४-६ बार भोजन के पूर्व थोड़े पानी में १०-१५ बूँदें लें। दौरों में, प्रत्येक १५ मिनट पर यही खुराक अनुमोदित है।

टिप्पणी: पूरक मिश्रण के रूप में :
R 14, तीव्र व्यग्रता में।
R 34, कैल्शियम तत्वों की कमी तथा अतिपेशी उत्तेजना में।
स्नायुशूल में R 16, अल्परक्तता तथा थका देने वाले रोगों के बाद R 31।
गले में तथा मुँह के पिछले भाग में जलन में R 1।
बैठे हुए गले (hoarseness) तथा कण्ठनली के नज़ले में R 45।
हालाँकि, स्थिति के अनुसार कोई अतिरिक्त पूरक दवा प्रयोग करने के पूर्व, कुछ दिनों तक केवल R 47 ही प्रयुक्त होनी चाहिए।

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